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महाशिवरात्रि के बाद महाकाल में होने वाली दुर्लभ रस्म: ‘सेहरा दर्शन’ और सप्तधान्य श्रृंगार का अद्भुत महत्व

उज्जैन: महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का उत्सव है। देशभर के शिवालयों में इस रात्रि विशेष पूजा-अर्चना होती है, लेकिन मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में इसका स्वरूप अत्यंत अद्वितीय और भव्य होता है। यहां विराजमान भगवान महाकाल की आराधना वर्षभर विशेष विधि-विधान से की जाती है, परंतु महाशिवरात्रि के अगले दिन होने वाली एक खास परंपरा इसे और भी विशिष्ट बना देती है।

दूल्हे के रूप में महाकाल: ‘सेहरा दर्शन’

महाशिवरात्रि के अगले दिन तड़के प्रातः भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसे ‘सेहरा दर्शन’ कहा जाता है। इस दिन वैराग्य स्वरूप धारण करने वाले भोलेनाथ एक मनोहारी दूल्हे के रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। उनके मस्तक पर भव्य सेहरा सजाया जाता है, जो शिव-पार्वती विवाह की स्मृति और उत्सव का प्रतीक माना जाता है।

यह सेहरा केवल पुष्पों से निर्मित नहीं होता, बल्कि इसमें विशेष रूप से ‘सप्तधान्य’ का भी उपयोग किया जाता है। भगवान को आकर्षक मुखौटा धारण कराया जाता है, जिससे उनका दिव्य स्वरूप और भी प्रभावशाली दिखाई देता है। यह दृश्य भक्तों को भाव-विभोर कर देता है और मंदिर परिसर में अलौकिक वातावरण निर्मित हो जाता है।

सप्तधान्य श्रृंगार का आध्यात्मिक महत्व

‘सप्तधान्य’ का अर्थ है सात प्रकार के अनाज-चावल, खड़ा मूंग, तिल, मसूर, गेहूं, जौ और खड़ा उड़द। इन सातों धान्यों को शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारतीय परंपरा में अन्न को ‘अन्नपूर्णा’ का आशीर्वाद और प्रकृति का वरदान समझा जाता है।

सेहरे में इन सात अनाजों का उपयोग यह दर्शाता है कि भगवान शिव संपूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता हैं और प्रकृति के प्रत्येक अंश में उनकी उपस्थिति है। यह श्रृंगार वर्ष में केवल एक बार होता है, इसलिए इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता अत्यंत अधिक मानी जाती है।

सेहरा आरती और विशेष प्रसाद

श्रृंगार के उपरांत विशेष ‘सेहरा आरती’ की जाती है। जब यह अनुष्ठान पूर्ण हो जाता है और सेहरा उतारा जाता है, तब उसमें प्रयुक्त सप्तधान्य को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

मान्यता है कि यह प्रसाद अत्यंत शुभ और चमत्कारी होता है। श्रद्धालु इसे अपने घर की तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रखते हैं। विश्वास किया जाता है कि इससे घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती और सुख-समृद्धि का वास बना रहता है।

परंपरा के अनुसार, इस सप्तधान्य का एक अंश राजकोष में भी सुरक्षित रखा जाता है, जिससे राज्य में समृद्धि और आर्थिक स्थिरता बनी रहे।

आस्था और परंपरा का अनूठा संगम

महाशिवरात्रि के बाद होने वाला यह ‘सेहरा दर्शन’ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और समृद्धि के प्रतीकों का अनूठा संगम है। उज्जैन की पावन भूमि पर यह परंपरा भक्तों को यह संदेश देती है कि त्याग और वैराग्य के साथ-साथ जीवन में आनंद और मंगल भाव का भी उतना ही महत्व है।महाकाल के इस दिव्य दूल्हा स्वरूप के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए वर्ष का एक अत्यंत दुर्लभ और पुण्य अवसर माना जाता है।

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Kanha Shastri

Kanha Shastri