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सड़क की उम्मीद और सरकारी फाइलों का सच: RTI ने खोली विकास की हकीकत

वर्षों से पक्की सड़क की आस में ग्रामीण, चुनावी वादों और सरकारी आश्वासनों के बीच अटका विकास – सूचना के अधिकार से सामने आई फाइलों की तस्वीर

ग्रामीण भारत में सड़क सिर्फ आवागमन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिक विकास की पहली जरूरत है। लेकिन देश के अनेक ग्रामीण इलाकों में आज भी लोगों को पक्की सड़क के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ रहा है। चुनाव के समय सड़क निर्माण के वादे किए जाते हैं, जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रयास का भरोसा दिलाया जाता है और प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई का आश्वासन मिलता है, लेकिन समय बीतने के साथ ये आश्वासन सरकारी फाइलों में दबकर रह जाते हैं।

ऐसे ही एक मामले में लंबे समय से पक्की सड़क की प्रतीक्षा कर रहे ग्रामीणों ने जब लगातार मांग और शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं देखी, तो उन्होंने सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) का सहारा लिया। आरटीआई के माध्यम से सड़क निर्माण से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया, स्वीकृति, बजट और विभागीय कार्रवाई की जानकारी मांगी गई। सामने आई जानकारी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर ग्रामीणों की वर्षों पुरानी जरूरत सरकारी व्यवस्था में किस स्तर पर अटकी हुई है?

चुनावी वादों से शुरू होती है उम्मीद, लेकिन सड़क धरातल पर नहीं उतरती

ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क निर्माण अक्सर चुनावी मुद्दों में प्रमुखता से शामिल रहता है। जनप्रतिनिधि गांवों का दौरा करते हैं, ग्रामीणों की समस्याएं सुनते हैं और सड़क निर्माण को प्राथमिकता देने का भरोसा देते हैं।

इसके बाद ग्रामीणों को उम्मीद होती है कि जल्द ही खराब रास्तों से मुक्ति मिलेगी। बरसात में कीचड़, गड्ढों और जलभराव से जूझने वाले रास्तों की जगह पक्की सड़क बनेगी और गांव मुख्य सड़क तथा बाजार से बेहतर तरीके से जुड़ सकेगा।

लेकिन कई मामलों में घोषणा और निर्माण के बीच का अंतर वर्षों में बदल जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण की मांग नई नहीं है। लगातार आवेदन, जनप्रतिनिधियों से मुलाकात और अधिकारियों के समक्ष शिकायत के बावजूद यदि सड़क का निर्माण शुरू नहीं होता, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि आखिर अड़चन कहां है?

RTI ने खोला सरकारी प्रक्रिया का पन्ना

जब मौखिक आश्वासनों से कोई समाधान नहीं निकला, तब ग्रामीणों ने सूचना के अधिकार के तहत संबंधित विभाग से सड़क निर्माण की वास्तविक स्थिति की जानकारी मांगी।

आरटीआई के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया गया कि-

  • सड़क निर्माण के लिए प्रस्ताव कब तैयार हुआ?
  • क्या सड़क को प्रशासनिक स्वीकृति मिली?
  • क्या तकनीकी एवं वित्तीय स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी हुई?
  • सड़क निर्माण के लिए बजट का प्रावधान हुआ या नहीं?
  • फाइल वर्तमान में किस विभाग या अधिकारी के पास है?
  • सड़क निर्माण के संबंध में अब तक क्या कार्रवाई की गई?
  • जिम्मेदार विभाग कौन सा है?
  • निर्माण कार्य शुरू करने में देरी का वास्तविक कारण क्या है?

आरटीआई से मिली जानकारी ने ग्रामीणों को सरकारी प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति समझने का आधार दिया। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि किसी सड़क की घोषणा हो जाना और उसके लिए वास्तविक बजट, स्वीकृति तथा निर्माण प्रक्रिया पूरी होना दो अलग-अलग बातें हैं।

कागजों में घूमती रही फाइल, ग्रामीण करते रहे इंतजार

सड़क निर्माण की प्रक्रिया कई स्तरों से गुजरती है। प्रस्ताव तैयार होने से लेकर सर्वे, तकनीकी स्वीकृति, प्रशासनिक स्वीकृति, वित्तीय स्वीकृति, बजट आवंटन और टेंडर जैसी प्रक्रियाओं के बाद ही निर्माण कार्य जमीन पर उतरता है।

समस्या तब गंभीर हो जाती है जब इन प्रक्रियाओं में अनावश्यक देरी होती है।

ग्रामीणों के लिए सरकारी फाइल का एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक जाना महज प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन उनके लिए इसका मतलब है—एक और बरसात, एक और साल और सड़क के लिए एक और इंतजार।

यही कारण है कि आरटीआई से मिली जानकारी ग्रामीणों के लिए केवल कागज का जवाब नहीं, बल्कि अपनी समस्या की वास्तविक स्थिति जानने का माध्यम बन गई है।

बजट के बिना घोषणाओं पर भी उठे सवाल

ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क निर्माण की घोषणा होने के बाद लोगों को स्वाभाविक रूप से उम्मीद होती है कि अब निर्माण जल्द शुरू होगा। लेकिन किसी परियोजना की घोषणा तभी धरातल पर उतर सकती है, जब उसके लिए आवश्यक वित्तीय प्रावधान और स्वीकृति की प्रक्रिया भी पूरी हो।

कई मामलों में ऐसी स्थिति सामने आती है कि राजनीतिक स्तर पर सड़क बनाने की बात कही जाती है, लेकिन संबंधित विभाग के पास तत्काल निर्माण के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध नहीं होता।

इस स्थिति में सवाल सिर्फ घोषणा का नहीं, बल्कि घोषणा के बाद उसे पूरा करने की प्रशासनिक और वित्तीय जिम्मेदारी का भी है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि सड़क निर्माण के लिए बजट उपलब्ध नहीं है, तो उन्हें स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए। उन्हें वर्षों तक आश्वासन देकर इंतजार कराने के बजाय यह बताया जाना चाहिए कि सड़क कब और किस योजना के तहत बनाई जाएगी।

विभागीय जिम्मेदारी के बीच पिसता ग्रामीण

ग्रामीण सड़क निर्माण से जुड़े मामलों में कई बार अलग-अलग विभागों की भूमिका सामने आती है। सड़क किस योजना के अंतर्गत आती है, उसका निर्माण कौन सा विभाग करेगा और बजट किस मद से आएगा—इन सवालों पर विभागीय स्तर पर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से भी काम में देरी होती है।

यदि एक विभाग दूसरे विभाग की ओर जिम्मेदारी डालता रहे और दूसरा विभाग प्रक्रिया या स्वीकृति का हवाला देता रहे, तो इसका सीधा नुकसान ग्रामीणों को उठाना पड़ता है।

ग्रामीण के लिए सड़क PWD की है या ग्रामीण विकास विभाग की यह महत्वपूर्ण नहीं है। उसके लिए महत्वपूर्ण यह है कि सड़क बने।

यही वजह है कि आरटीआई से सामने आए दस्तावेज अब जिम्मेदारी तय करने के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

सड़क नहीं तो स्वास्थ्य सेवाएं भी अधूरी

पक्की सड़क का अभाव ग्रामीण जीवन को कई स्तरों पर प्रभावित करता है। सबसे गंभीर असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है।

आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस को गांव तक पहुंचने में परेशानी हो सकती है। खराब सड़क और बरसात के दौरान कीचड़ तथा जलभराव के कारण मरीजों को मुख्य मार्ग तक पहुंचाना कठिन हो जाता है।

गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति, बुजुर्ग, गर्भवती महिला या दुर्घटना के शिकार व्यक्ति के लिए समय पर अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी होता है। ऐसे में खराब सड़क केवल असुविधा नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु से जुड़ा विषय बन सकती है।

बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ता है असर

सड़क का सीधा असर शिक्षा पर भी पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई बच्चे रोजाना दूसरे गांवों या कस्बों में स्कूल जाते हैं।

बरसात के दौरान रास्ता खराब होने पर बच्चों को स्कूल पहुंचने में परेशानी होती है। कई बार अभिभावक बच्चों को ऐसे रास्तों पर भेजने से भी बचते हैं।

इस तरह सड़क की समस्या धीरे-धीरे शिक्षा के अवसरों को भी प्रभावित करती है।

किसानों के लिए बढ़ जाती है परिवहन लागत

ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार कृषि है। किसान अपनी फसल को खेत से मंडी, संग्रहण केंद्र या स्थानीय बाजार तक पहुंचाने के लिए सड़क परिवहन पर निर्भर रहते हैं।

यदि रास्ता खराब है तो ट्रैक्टर, ट्रक या अन्य वाहनों की आवाजाही मुश्किल हो जाती है। परिवहन लागत बढ़ती है और फसल को बाजार तक पहुंचाने में अधिक समय लगता है।

इसका सीधा असर किसान की आय पर पड़ सकता है। सड़क बेहतर होने पर न केवल आवागमन आसान होता है, बल्कि कृषि उपज को बाजार तक पहुंचाने की लागत और समय भी कम हो सकता है।

बारिश आते ही बढ़ जाती है समस्या

गर्मी के दिनों में खराब सड़क किसी तरह चल भी जाती है, लेकिन बारिश शुरू होते ही ग्रामीणों की मुश्किल कई गुना बढ़ जाती है।

कच्चे रास्ते कीचड़ में बदल जाते हैं। जगह-जगह गड्ढों में पानी भर जाता है और दोपहिया वाहनों से लेकर चारपहिया वाहनों तक की आवाजाही मुश्किल हो जाती है।

यही वह समय होता है जब ग्रामीणों को सबसे अधिक महसूस होता है कि पक्की सड़क उनके लिए कितनी जरूरी है।

RTI बना ग्रामीणों की आवाज

सूचना का अधिकार कानून आम नागरिक को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही मांगने का अधिकार देता है। सड़क निर्माण जैसे सार्वजनिक महत्व के मामलों में आरटीआई के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किसी प्रस्ताव पर वास्तव में क्या कार्रवाई हुई और मामला किस स्तर पर लंबित है।

इस मामले में भी आरटीआई ग्रामीणों के लिए महत्वपूर्ण माध्यम बनकर सामने आया है।

अब सवाल केवल यह नहीं रह गया कि “सड़क कब बनेगी?”

बल्कि सवाल यह है कि-

“सड़क निर्माण की प्रक्रिया किस स्तर पर रुकी है, किसके पास फाइल लंबित है और उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी किसकी है?”

अब आश्वासन नहीं, समयबद्ध कार्रवाई की मांग

आरटीआई से जानकारी सामने आने के बाद ग्रामीणों के पास अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगने का ठोस आधार उपलब्ध हो गया है।

अब आवश्यकता है कि संबंधित विभाग पूरे मामले की समीक्षा करे और यह स्पष्ट करे कि सड़क निर्माण में वास्तविक बाधा क्या है। यदि स्वीकृति लंबित है तो उसे पूरा किया जाए। यदि बजट की आवश्यकता है तो वित्तीय प्रावधान किया जाए और यदि विभागीय स्तर पर कोई प्रक्रिया अधूरी है तो उसे समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए।

ग्रामीणों की मांग केवल सड़क बनाने की नहीं, बल्कि सड़क निर्माण की स्पष्ट समयसीमा घोषित करने की भी होनी चाहिए।

विकास का पैमाना कागज नहीं, जमीन पर दिखना चाहिए

सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों का वास्तविक मूल्यांकन फाइलों, घोषणाओं और बैठकों से नहीं, बल्कि उनके धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से होता है।

किसी गांव के लिए पक्की सड़क बन जाना उसके विकास की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है। सड़क से अस्पताल, स्कूल, बाजार, रोजगार और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच आसान होती है।

इसलिए वर्षों से लंबित सड़क को केवल एक निर्माण परियोजना मानना उचित नहीं होगा। यह ग्रामीणों के अधिकार, सम्मान और बेहतर जीवन की बुनियादी आवश्यकता से जुड़ा विषय है।

अब देखना यह है कि फाइल आगे बढ़ती है या फिर इंतजार जारी रहता है

आरटीआई ने सरकारी प्रक्रिया की तस्वीर ग्रामीणों के सामने रख दी है। अब असली परीक्षा प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की है।

क्या आरटीआई में सामने आई जानकारी के आधार पर जिम्मेदारी तय होगी?

क्या वर्षों से लंबित सड़क के लिए बजट और स्वीकृति की प्रक्रिया तेज होगी?

क्या ग्रामीणों को सड़क निर्माण की निश्चित समयसीमा मिलेगी?

या फिर एक बार फिर आश्वासन की फाइल तैयार होगी और ग्रामीण अगली बरसात का इंतजार करेंगे?

ग्रामीणों को अब कागजी आश्वासन नहीं, धरातल पर सड़क चाहिए। आरटीआई ने सवाल पूछने का रास्ता खोल दिया है-अब जवाबदेही तय करने और सड़क को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी प्रशासन की है।

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