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भारत की लूट: इतिहास के पन्नों से आज की जवाबदेही तक

अतीत को भूलना नहीं, वर्तमान को छिपाना नहीं हर दौर के तथ्य सामने रखना जरूरी है।

– पंडित कान्हा शास्त्री (writer,and social analyst)

भारत की आर्थिक लूट की चर्चा होते ही हमारा विमर्श अक्सर दो हिस्सों में बंट जाता है। एक पक्ष ब्रिटिश शासन और अंग्रेजों द्वारा भारत के आर्थिक शोषण को सामने रखता है, जबकि दूसरा पक्ष आजादी के बाद सामने आए भ्रष्टाचार, घोटालों और आर्थिक अपराधों की लंबी सूची गिनाता है। लेकिन इतिहास और वर्तमान को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के बजाय दोनों को उनके संदर्भ में समझना अधिक जरूरी है। आजादी से पहले भारत की राजनीतिक सत्ता विदेशी शासन के हाथों में थी, जबकि 1947 के बाद देश की सत्ता भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं के हाथ में आई। इसलिए औपनिवेशिक दौर को समझना इतिहास की जिम्मेदारी है और स्वतंत्र भारत में हुई गड़बड़ियों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक नागरिक की जिम्मेदारी।

भारत में औपनिवेशिक आर्थिक शोषण की शुरुआत को समझने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी का उल्लेख आवश्यक है। व्यापार करने आई कंपनी धीरे-धीरे राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति में बदल गई। 1757 के प्लासी युद्ध के बाद बंगाल में उसका प्रभाव तेजी से बढ़ा और 1765 में बंगाल की दीवानी मिलने के बाद कंपनी को राजस्व वसूली पर महत्वपूर्ण नियंत्रण प्राप्त हो गया। इस व्यवस्था ने व्यापारिक हितों और राजनीतिक सत्ता को एक-दूसरे से जोड़ दिया और भारतीय संसाधनों का उपयोग ब्रिटिश साम्राज्य के हित में होने लगा।

रॉबर्ट क्लाइव का नाम भी इसी इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्लासी के बाद बंगाल में कंपनी की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति मजबूत हुई तथा क्लाइव को निजी उपहारों और संपत्ति से जुड़े लाभ प्राप्त होने के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। इसी तरह वॉरेन हेस्टिंग्स का कार्यकाल भी राजस्व और प्रशासन से जुड़े विवादों के कारण इतिहास में महत्वपूर्ण है। उनके खिलाफ ब्रिटेन की संसद में महाभियोग की कार्यवाही तक हुई, हालांकि अंततः वे बरी हो गए। लॉर्ड डलहौजी का नाम मुख्य रूप से Doctrine of Lapse और ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार से जुड़ा है। इसलिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से “लुटेरा” कहने के बजाय उस समय की औपनिवेशिक विस्तारवादी नीति के संदर्भ में देखना अधिक ऐतिहासिक रूप से उचित है।

दरअसल ब्रिटिश शासन के दौरान भारत का आर्थिक शोषण किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत गतिविधि नहीं था, बल्कि एक व्यापक औपनिवेशिक व्यवस्था का हिस्सा था। राजस्व व्यवस्था, व्यापारिक नीतियां, कच्चे माल का दोहन और भारतीय बाजारों का इस्तेमाल ब्रिटिश साम्राज्य के हितों से जुड़ा हुआ था। इसलिए भारत की औपनिवेशिक आर्थिक लूट को समझने के लिए केवल कुछ अंग्रेज अधिकारियों के नाम गिनाना पर्याप्त नहीं है; पूरी व्यवस्था, उसकी नीतियों और उसके आर्थिक प्रभावों को समझना आवश्यक है।

1947 में भारत स्वतंत्र हुआ और देश की राजनीतिक सत्ता भारतीयों के हाथ में आई। संविधान, संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं ने देश की शासन व्यवस्था को आकार दिया। लेकिन स्वतंत्रता के बाद भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। उनका स्वरूप बदल गया। अब मामला विदेशी शासन द्वारा संसाधनों के दोहन का नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की संस्थाओं, सार्वजनिक धन और आर्थिक व्यवस्था के भीतर होने वाली अनियमितताओं का था।

स्वतंत्र भारत के शुरुआती बड़े वित्तीय विवादों में हरिदास मुंधड़ा से जुड़ा LIC मामला उल्लेखनीय है। 1950 के दशक में मुंधड़ा से जुड़े शेयर निवेश प्रकरण ने संसद और सरकार को गंभीर सवालों के घेरे में ला दिया। इसके बाद समय-समय पर वित्तीय बाजार और बैंकिंग व्यवस्था में बड़े विवाद सामने आते रहे। 1992 का हर्षद मेहता प्रतिभूति घोटाला भारतीय शेयर बाजार और बैंकिंग प्रणाली की कमजोरियों का बड़ा उदाहरण बना। बैंकिंग प्रणाली और प्रतिभूति लेनदेन से जुड़ी अनियमितताओं ने वित्तीय नियमन पर गंभीर सवाल खड़े किए। इसके बाद केतन पारेख से जुड़े शेयर बाजार हेरफेर के मामले ने भी यह दिखाया कि वित्तीय बाजारों में पारदर्शिता और मजबूत नियमन कितना जरूरी है।

अब्दुल करीम तेलगी से जुड़ा नकली स्टाम्प पेपर मामला भी स्वतंत्र भारत के चर्चित आर्थिक अपराधों में शामिल रहा। इस मामले ने सरकारी दस्तावेजों और राजस्व व्यवस्था में भ्रष्टाचार के नेटवर्क की गंभीरता को सामने रखा। इसी तरह 2009 में सत्यम कंप्यूटर से जुड़े लेखांकन घोटाले ने कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर देश और दुनिया में गंभीर सवाल खड़े किए। कंपनी के खातों में बड़े पैमाने पर वित्तीय हेरफेर सामने आने के बाद यह मामला भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी बन गया।

2010 के दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों से जुड़े मामलों में भी ठेकों, खरीद प्रक्रियाओं, कीमतों और निगरानी को लेकर गंभीर सवाल उठे। सुरेश कलमाड़ी का नाम इस पूरे प्रकरण में प्रमुखता से सामने आया। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG तथा अन्य जांच प्रक्रियाओं में कई प्रक्रियागत कमियों और अनियमितताओं की चर्चा हुई। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—CAG की आपत्ति, अनुमानित वित्तीय नुकसान और अदालत में सिद्ध आपराधिक दोष तीन अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति पर आरोप लगना अपने आप में उसे न्यायिक रूप से दोषी सिद्ध नहीं करता।

2G स्पेक्ट्रम आवंटन विवाद भी इसी बात का बड़ा उदाहरण है। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा, कनिमोझी सहित कई लोगों पर आरोप लगाए गए। CAG की रिपोर्ट में संभावित राजस्व नुकसान का अनुमान सामने आया, लेकिन 2017 में विशेष CBI अदालत ने सभी 19 आरोपियों को बरी कर दिया। इसलिए आज ए. राजा या कनिमोझी को “सिद्ध घोटालेबाज” कहना न्यायिक रिकॉर्ड के अनुरूप नहीं होगा। यह मामला हमें सिखाता है कि राजनीतिक आरोप, जांच और न्यायालय के अंतिम फैसले को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

कोयला ब्लॉक आवंटन विवाद भी देश के बड़े नीतिगत और प्रशासनिक विवादों में शामिल रहा। CAG की रिपोर्ट और उसके बाद हुई न्यायिक कार्यवाही ने आवंटन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी संख्या में कोयला ब्लॉक आवंटनों को रद्द किया। लेकिन इस पूरे मामले को किसी एक व्यक्ति द्वारा “इतने हजार करोड़ की लूट” के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से अत्यधिक सरलीकरण होगा। यहां भी नीति, प्रक्रिया, संभावित आर्थिक नुकसान और व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी के बीच अंतर करना जरूरी है।

इसके बाद बैंकिंग और कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़े कई बड़े मामले देश के सामने आए। विजय माल्या और किंगफिशर एयरलाइंस से जुड़े बैंक ऋण विवाद, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी से जुड़े पंजाब नेशनल बैंक धोखाधड़ी मामले तथा सहारा समूह से जुड़े निवेश और धन जुटाने के विवादों ने बैंकिंग और वित्तीय नियमन की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। इसी तरह ABG Shipyard से जुड़े बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में भी बड़ी राशि के बैंक दावों और जांच की बात सामने आई। इन मामलों ने यह प्रश्न उठाया कि बैंकिंग व्यवस्था में बड़े ऋणों की निगरानी, जोखिम आकलन और वसूली की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।

हाल के वर्षों में सुभाष चंद्रा और Essel समूह से जुड़े ऋण तथा insolvency मामले ने भी चर्चा पैदा की। NCLT से जुड़ी कार्यवाही में बड़े admitted claims और उनके मुकाबले स्वीकृत repayment plan की खबरें सामने आईं। लेकिन यहां भी शब्दों का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। किसी कंपनी या व्यक्ति के खिलाफ बड़े ऋण या admitted claims होना अपने आप में “इतने हजार करोड़ की चोरी” सिद्ध नहीं करता। ऋण, दावा, देनदारी, अनुमानित नुकसान और सिद्ध आपराधिक अपराध इन सभी की कानूनी प्रकृति अलग-अलग होती है।

यही वह बिंदु है जहां भारत में आर्थिक लूट पर होने वाली बहस को अधिक गंभीर और तथ्यपरक बनाने की आवश्यकता है। अंग्रेजों के औपनिवेशिक शोषण को भूलना इतिहास के साथ अन्याय होगा, लेकिन उसी इतिहास का इस्तेमाल आज के भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए करना भी उचित नहीं है। इसी तरह स्वतंत्र भारत में हुए हर आर्थिक विवाद को “देश की पूरी व्यवस्था की लूट” बताना भी तथ्यात्मक दृष्टि से सही नहीं होगा। लोकतंत्र में सवाल व्यक्ति या पार्टी देखकर नहीं, बल्कि प्रमाण और तथ्यों के आधार पर पूछे जाने चाहिए।

सबसे बड़ी समस्या केवल रकम की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है। सोशल मीडिया पर अक्सर अलग-अलग घोटालों और विवादों की रकम जोड़कर यह दावा किया जाता है कि भारत को इतने लाख करोड़ रुपये “लूटे” गए। लेकिन किसी CAG रिपोर्ट में उल्लिखित संभावित नुकसान, बैंक का बकाया ऋण, शेयर बाजार में निवेशकों का नुकसान और अदालत में सिद्ध चोरी की रकम को जोड़कर एक ही आंकड़ा बना देना आर्थिक और कानूनी रूप से भ्रामक हो सकता है। अनुमानित नुकसान घोटाले की सिद्ध रकम नहीं होता, बैंक का बकाया अपने आप में चोरी नहीं होता और आरोप लगना अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं होता।

इतिहास में सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण का स्वरूप अलग था। आज आर्थिक अपराधों के तरीके बदल गए हैं। कहीं फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल होता है, कहीं बैंकिंग धोखाधड़ी होती है, कहीं ठेकों और खरीद प्रक्रियाओं में अनियमितता के आरोप लगते हैं, कहीं कर चोरी का मामला सामने आता है और कहीं कंपनियों के खातों में हेरफेर के आरोप लगते हैं। इसलिए आज का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “भारत को पहले किसने लूटा?” बल्कि यह होना चाहिए कि “आज देश के पैसे और संसाधनों की रक्षा कौन कर रहा है और नुकसान होने पर जवाबदेही किसकी तय होगी?”

भारत का इतिहास हमें अतीत की गलतियों से सीखने की प्रेरणा देता है और लोकतंत्र हमें वर्तमान पर सवाल उठाने का अधिकार देता है। इतिहास को भूलना नहीं चाहिए, लेकिन वर्तमान को छिपाने के लिए इतिहास का सहारा भी नहीं लेना चाहिए। इसी तरह वर्तमान की किसी गलती के आधार पर देश की पूरी लोकतांत्रिक यात्रा को नकार देना भी उचित नहीं है। देश किसी एक पार्टी, सरकार या व्यक्ति का नहीं, बल्कि जनता का है और जनता के धन की रक्षा करना हर सरकार, हर संस्था और हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

इतिहास पर रोना आसान है, लेकिन वर्तमान को बदलना कठिन। इतिहास में भारत के आर्थिक शोषण का अध्ययन होना चाहिए और आजादी के बाद सामने आए भ्रष्टाचार तथा आर्थिक अपराधों की भी पूरी और निष्पक्ष पड़ताल होनी चाहिए। लेकिन हर नाम के साथ यह भी बताया जाना चाहिए कि आरोप क्या था, जांच में क्या सामने आया, कितना नुकसान वास्तव में सिद्ध हुआ और अदालत ने अंततः क्या फैसला दिया।

क्योंकि लोकतंत्र में किसी को केवल आरोप के आधार पर दोषी ठहराना भी अन्याय है और किसी सिद्ध अपराध पर राजनीतिक पहचान के कारण पर्दा डालना भी अन्याय है। भारत को भावनात्मक नारों से अधिक सत्य, तथ्य और जवाबदेही की आवश्यकता है।

जो बीत गया, उससे सीखिए।
जो आज हो रहा है, उस पर सवाल कीजिए।
और जो कल होना है, उसे बेहतर बनाने की जिम्मेदारी उठाइए।

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