Skip to content

परीक्षा, परिणाम और बचपन का बढ़ता मानसिक संकट-पंडित कान्हा शास्त्री

परीक्षाओं और परिणामों के समय देशभर में जिस प्रकार की अप्रिय घटनाएँ समय-समय पर सामने आती हैं, वे केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि हमारी शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं। परीक्षा का उद्देश्य ज्ञान और समझ का मूल्यांकन होना चाहिए, परंतु धीरे-धीरे यह बच्चों के आत्मसम्मान, पारिवारिक प्रतिष्ठा और सामाजिक स्वीकार्यता का पैमाना बनती जा रही है। परिणाम घोषित होने के दिनों में अवसाद, आत्मग्लानि, घर से भाग जाने, आत्म-क्षति अथवा आत्महत्या जैसे कदमों की खबरें बताती हैं कि हम बच्चों पर अपेक्षाओं का ऐसा बोझ डाल रहे हैं जिसे वे मानसिक रूप से वहन करने के लिए तैयार नहीं होते। अंक अब उपलब्धि का साधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रमाण बनते जा रहे हैं।

इस समस्या की जड़ केवल परीक्षा प्रणाली में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है जिसने सफलता को सीमित परिभाषा में बांध दिया है। परिवारों में तुलना की संस्कृति, “फलां के बच्चे ने इतने अंक लाए” जैसे वाक्य, और सामाजिक प्रतिष्ठा को परिणाम से जोड़ देना बच्चों के भीतर असुरक्षा की भावना भर देता है। किशोरावस्था वह समय है जब पहचान निर्माण की प्रक्रिया चल रही होती है। ऐसे में असफलता उन्हें व्यक्तिगत विफलता लगती है, जबकि वयस्क जानते हैं कि जीवन अनेक अवसरों का नाम है। संवाद की कमी इस दूरी को और गहरा कर देती है। माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक बातचीत घटती जा रही है, और डिजिटल दुनिया ने इस खाई को और चौड़ा किया है।

परीक्षा तनाव के साथ-साथ बच्चों के शोषण का प्रश्न भी उतना ही गंभीर है। शोषण केवल शारीरिक नहीं होता; अत्यधिक अपेक्षाएँ थोपना, विश्राम और खेल का समय छीन लेना, लगातार कोचिंग और प्रतिस्पर्धा में झोंक देना भी मानसिक शोषण है। कई बच्चे साइबर बुलिंग, शिक्षण संस्थानों में अपमानजनक व्यवहार या घरेलू दबाव का सामना करते हैं, परंतु भय और अविश्वास के कारण खुलकर कह नहीं पाते। जब बच्चे अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर पाते, तो वह भीतर ही भीतर दबाव बनकर खतरनाक रूप ले लेती है। परीक्षा और परिणाम का समय इस दबाव को चरम पर पहुँचा देता है।

समुचित उपायों की दिशा में सबसे पहला कदम मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा मानना है। विद्यालयों में प्रशिक्षित काउंसलर की नियमित नियुक्ति, परीक्षा से पहले और बाद में तनाव प्रबंधन सत्र, तथा अभिभावकों के लिए परामर्श कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिए। शिक्षकों को भी व्यवहारिक संकेतों की पहचान का प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है, ताकि वे बच्चों में अवसाद, चिंता या आत्म-क्षति के लक्षण समय रहते पहचान सकें। परिणाम घोषित होने के दिनों में हेल्पलाइन और मनोवैज्ञानिक सहायता व्यवस्था सक्रिय रखी जानी चाहिए, ताकि किसी भी संकटग्रस्त छात्र को तत्काल सहारा मिल सके।

परिवारों की भूमिका इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। अभिभावकों को यह स्वीकार करना होगा कि बच्चा अंक नहीं, व्यक्तित्व है। तुलना और तिरस्कार के स्थान पर प्रोत्साहन और विश्वास का वातावरण बनाया जाना चाहिए। असफलता को जीवन का अंत नहीं, सीखने का अवसर बताया जाए। प्रतिदिन कुछ समय बच्चों के साथ बिना मोबाइल और बिना किसी मूल्यांकन के बिताना, उनकी भावनाएँ सुनना और उनकी रुचियों को महत्व देना मानसिक सुरक्षा का आधार बन सकता है। बच्चों को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि परिणाम चाहे जो हो, परिवार का स्नेह और समर्थन अटल रहेगा।

नीति स्तर पर परीक्षा प्रणाली में भी सुधार की आवश्यकता है। सतत मूल्यांकन, प्रायोगिक कौशल, खेल, कला और जीवन कौशल को महत्व देने वाली प्रणाली बच्चों पर एकमुश्त परिणाम का दबाव कम कर सकती है। मीडिया और समाज को भी जिम्मेदारी निभानी होगी; परिणामों को सनसनी की तरह प्रस्तुत करने के बजाय संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। शिक्षा का लक्ष्य केवल सफल पेशेवर तैयार करना नहीं, बल्कि स्वस्थ, आत्मविश्वासी और संवेदनशील नागरिक बनाना है।

अंततः प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार का समाज बनाना चाहते हैं अंकों की दौड़ में भागता हुआ या बच्चों की भावनाओं को समझने वाला? परीक्षा और परिणाम जीवन की यात्रा का एक पड़ाव हैं, अंतिम मंजिल नहीं। यदि हम अभी भी संवाद, संवेदनशीलता और संरचनात्मक सुधार की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते, तो हर वर्ष दोहराई जाने वाली त्रासदियाँ हमारी सामूहिक असफलता का प्रमाण बनती रहेंगी। बचपन को सुरक्षित, संतुलित और आश्वस्त बनाना ही सच्ची प्रगति का मानदंड होना चाहिए।

ख़बर शेयर करें:

Description of the image
Tarendra Dansena

Tarendra Dansena