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वेतन लाखों में,पर ईमान शून्य-छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार की जड़ें और उसका धर्मसंकट: पंडित कान्हा शास्त्री

भ्रष्टाचार पर प्रहार या चेतावनी का शंखनाद?

छत्तीसगढ़ में (ACB) की लगातार कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शासन भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर रुख अपनाए हुए है। आए दिन अधिकारी रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े जा रहे हैं। यह स्थिति दो संदेश देती है एक, निगरानी तंत्र सक्रिय है; दूसरा, व्यवस्था के भीतर कहीं न कहीं लोभ और अवसरवादिता अभी भी जीवित है। प्रश्न यह है कि जब वेतन, सुविधाएँ और सामाजिक प्रतिष्ठा पर्याप्त हैं, तब भी कुछ अधिकारी अपने पद की गरिमा को क्यों दांव पर लगा रहे हैं?

रिश्वतखोरी केवल कानून का उल्लंघन नहीं, यह सामाजिक विश्वास का हनन है। जब कोई अधिकारी किसी वैध कार्य-जैसे लाइसेंस, प्रमाणपत्र, उचित मूल्य दुकान या अन्य प्रशासनिक अनुमति-के बदले धन मांगता है, तो वह नागरिक के अधिकार को बंधक बना देता है। यह लोकतांत्रिक शासन की आत्मा पर आघात है। सरकारी सेवा का मूल तत्व ‘लोकसेवा’ है, न कि ‘लाभ-साधन’। यदि पद को अवसर और अधिकार को आय का स्रोत समझ लिया जाए, तो प्रशासन का नैतिक आधार कमजोर हो जाता है।

नीति के स्तर पर देखा जाए तो समस्या केवल व्यक्तिगत लालच की नहीं, बल्कि संरचनात्मक शिथिलता की भी है। दंड प्रक्रिया में विलंब, विभागीय अनुशासन की कमी और अवैध संपत्ति की त्वरित कुर्की का अभाव-ये सब भ्रष्टाचार को अप्रत्यक्ष संरक्षण देते हैं। आवश्यकता है कि विशेष त्वरित न्यायालयों की स्थापना हो, दोष सिद्ध होते ही सेवा समाप्ति का कठोर प्रावधान लागू हो, और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पूर्ण डिजिटलीकरण किया जाए। पारदर्शिता जितनी बढ़ेगी, भ्रष्टाचार की संभावना उतनी घटेगी।

भारतीय दर्शन भी इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देता है। श्रीमद् भगवत गीता में कहा गया है-

“त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥”

अर्थात् काम, क्रोध और लोभ ये आत्मा के विनाश के द्वार हैं। भ्रष्टाचार का मूल कारण यही ‘लोभ’ है। यदि प्रशासनिक सेवा में मूल्यबोध, नैतिक प्रशिक्षण और आत्मानुशासन को पुनर्स्थापित किया जाए, तो कानून का भय ही नहीं, अंत:करण की चेतना भी मार्गदर्शक बनेगी।

आज आवश्यकता केवल गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण की है। जब तक पद को प्रतिष्ठा और सेवा को धर्म नहीं माना जाएगा, तब तक छिटपुट कार्रवाइयाँ होती रहेंगी और व्यवस्था बार-बार कलंकित होती रहेगी। प्रशासन और समाज दोनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि ईमानदारी अपवाद नहीं, मानक बने। यही सच्चे सुशासन की पहचान है।

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Tarendra Dansena

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