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मुझे दस मिनट दीजिए”-जबलपुर के छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में खुद लड़कर जीती MBBS सीट

12वीं पास अथर्व चतुर्वेदी ने अनुच्छेद 142 के तहत हासिल किया ऐतिहासिक आदेश

यह आवाज़ किसी वरिष्ठ अधिवक्ता या संवैधानिक विशेषज्ञ की नहीं थी, बल्कि अथर्व चतुर्वेदी की थी -जबलपुर का एक बारहवीं पास छात्र, जिसका सपना सिर्फ डॉक्टर बनना था।

निवासी: जबलपुर शिक्षा: महर्षि विद्या मंदिर, जबलपुर (12वीं) NEET 2024: 530 अंक श्रेणी: EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) पिता: मनोज चतुर्वेदी (हाईकोर्ट वकील) माता: गृहिणी

बिना लॉ पढ़े सुप्रीम कोर्ट में जीत

मध्य प्रदेश के निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू करने की स्पष्ट नीति न होने के कारण अथर्व को MBBS सीट नहीं मिल पा रही थी। उन्होंने पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां उनकी दलीलें सुनते हुए टिप्पणी की गई-“तुम्हें वकील बनना चाहिए, डॉक्टर नहीं।”

लेकिन अथर्व ने हार नहीं मानी। उन्होंने स्वयं विशेष अनुमति याचिका (SLP) का प्रारूप तैयार किया, पुराने फैसलों का अध्ययन किया और ऑनलाइन याचिका दायर कर दी। दिल्ली जाने का खर्च बचाने के लिए उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए स्वयं बहस की।

सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक 10 मिनट

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के समक्ष अथर्व ने विनम्रता से “मुझे दस मिनट और दीजिए” कहते हुए अपनी बात रखी।

उनकी तार्किक दलीलों से न्यायालय प्रभावित हुआ। कोर्ट ने माना कि यदि छात्र ने योग्यता प्राप्त की है, तो नीति के अभाव में उसका भविष्य प्रभावित नहीं होना चाहिए।

संविधान के अनुच्छेद 142का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट (NMC) और मध्य प्रदेश सरकार को अथर्व को प्रोविजनल एडमिशन देने का आदेश दिया।

यह केवल एक छात्र की जीत नहीं, बल्कि यह संदेश है कि दृढ़ निश्चय, अध्ययन और साहस से व्यवस्था के भीतर भी न्याय पाया जा सकता है।कभी-कभी इतिहास लिखने के लिए केवल दस मिनट ही पर्याप्त होते हैं।

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Kanha Shastri

Kanha Shastri