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टैरिफ युद्ध से वैश्विक पुनर्संतुलन तक: ज्योतिषीय परिप्रेक्ष्य में भारत

रायगढ़ । अमेरिकी राजनीति में तीखे आर्थिक राष्ट्रवाद और वैश्विक व्यापार तनाव के बढ़ते स्वर के बीच, DK संवाद की टीम ने ज्योतिर्विद, लेखक और सामाजिक विश्लेषक पंडित कान्हा शास्त्री से विस्तृत बातचीत की। चर्चा की शुरुआत अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump की हालिया बयानबाज़ी से हुई, जिसमें उन्होंने वैश्विक व्यापार संतुलन, टैरिफ नीति और “अमेरिका फर्स्ट” दृष्टिकोण को पुनः प्रमुखता दी। पंडित शास्त्री ने कहा कि इस प्रकार की राजनीतिक आक्रामकता केवल चुनावी रणनीति या कूटनीतिक दबाव का परिणाम नहीं होती, बल्कि यह समयचक्र की उस मनोवैज्ञानिक अवस्था को भी दर्शाती है जब राष्ट्र अपनी सीमाओं, संसाधनों और आर्थिक हितों को लेकर अधिक सजग और कभी-कभी आक्रामक हो जाते हैं। उनके अनुसार जब महाशक्तियाँ आर्थिक संरक्षणवाद की राह पकड़ती हैं, तब वैश्विक व्यवस्था में असंतुलन स्वाभाविक रूप से उभरता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि संरक्षणवादी नीतियों का प्रभाव केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विश्व बाजार की धारणा, विदेशी निवेश प्रवाह, मुद्रा विनिमय संतुलन और रणनीतिक साझेदारियों पर भी पड़ता है। भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर-दोनों का संगम है। एक ओर निर्यात क्षेत्र पर दबाव और बाज़ार में अस्थिरता की आशंका रहती है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक सप्लाई चेन के पुनर्गठन से भारत को विनिर्माण विस्तार, तकनीकी निवेश और वैकल्पिक उत्पादन केंद्र के रूप में उभरने का अवसर मिल सकता है।

ज्योतिषीय परिप्रेक्ष्य में पंडित कान्हा शास्त्री ने बताया कि वर्तमान कालखंड में शनि का गोचर जल तत्व की राशि में होने से वैश्विक संरचनाओं विशेषतः आर्थिक संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय तंत्र पर दबाव दिखाई देता है। शनि न्याय, अनुशासन और संरचना का कारक है; जब वह संवेदनशील राशि में संचरण करता है तो कठोर नीतियाँ, कर-संरचना में बदलाव, व्यापारिक नियंत्रण और प्रतिबंधात्मक निर्णय प्रबल होते हैं। उन्होंने कहा कि राहु की सक्रियता अचानक घोषणाओं, अप्रत्याशित नीतिगत मोड़ों और बाजार में मनोवैज्ञानिक उतार-चढ़ाव को जन्म देती है। यही कारण है कि विश्व स्तर पर संतुलित आर्थिक संवाद की अपेक्षा बयानबाज़ी और प्रतिस्पर्धात्मक दबाव अधिक दिखाई दे रहा है।

भारत के संदर्भ में उन्होंने स्वतंत्रता काल की राष्ट्रकुंडली (15 अगस्त 1947, मध्यरात्रि) का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए बताया कि वृषभ लग्न की इस कुंडली में चंद्रमा कर्क राशि में स्थित है, जो जनमानस की संवेदनशीलता और राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक है। वर्तमान गोचर में शनि का प्रभाव लाभ और संरचना से जुड़े भावों पर पड़ रहा है, जिससे आर्थिक अनुशासन, कर-पुनर्समीक्षा और नीतिगत कठोरता के संकेत मिलते हैं। राहु की सक्रियता अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अप्रत्याशित घटनाएँ और व्यापारिक उतार-चढ़ाव ला सकती है, किंतु यही राहु विदेशी निवेश, तकनीकी नवाचार और वैश्विक छवि में तीव्र उभार का भी कारण बनता है।

शास्त्री जी ने कहा कि गुरु (बृहस्पति) का आगामी अनुकूल गोचर भारत के वित्तीय और रणनीतिक निर्णयों को संतुलन प्रदान करेगा। गुरु जब राष्ट्रकुंडली के महत्वपूर्ण भावों को दृष्टि देता है, तो आर्थिक सुधार, नीति-स्थिरता और वैश्विक प्रतिष्ठा में वृद्धि के संकेत मिलते हैं। उन्होंने विशेष रूप से सेवा क्षेत्र, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रक्षा उत्पादन, कृषि-निर्यात और हरित ऊर्जा को आने वाले वर्षों में उन्नति का प्रमुख आधार बताया।

वैश्विक संदर्भ में उन्होंने कहा कि 2026 तक वैचारिक टकराव और आर्थिक पुनर्संतुलन की प्रक्रिया चलती रहेगी। शनि की प्रकृति पुरानी संरचनाओं को तोड़कर नए अनुशासन की स्थापना करना है, इसलिए यह समय पुनर्गठन का है। किंतु 2027 के पश्चात गुरु-शनि के संतुलित संबंध वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता और नए व्यापारिक संतुलन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करेंगे। उनके शब्दों में, “इतिहास साक्षी है कि जब भी शनि-राहु का प्रभाव तीव्र हुआ है, तब विश्व व्यवस्था में परिवर्तन आया है और वही परिवर्तन आगे चलकर नई स्थिरता का आधार भी बना है।”अमेरिका द्वारा 15% टैरिफ लागू किए जाने के निर्णय का प्रभाव बहुआयामी होगा। पहला, भारत सहित निर्यातक देशों के लिए अमेरिकी बाजार में लागत बढ़ेगी, जिससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है और कुछ क्षेत्रों में निर्यात घटने की आशंका रहेगी। दूसरा, वैश्विक व्यापार संतुलन पर दबाव बढ़ेगा, आपूर्ति श्रृंखलाओं में पुनर्संरचना की आवश्यकता पड़ेगी और बहुपक्षीय व्यापार वार्ताओं में तनाव बढ़ सकता है। तीसरा, भारत के लिए यह आत्मनिर्भरता, वैकल्पिक बाजारों की खोज और द्विपक्षीय समझौतों को पुनर्संतुलित करने का अवसर भी बन सकता है, जिससे दीर्घकाल में आर्थिक नीति अधिक रणनीतिक और सशक्त हो सके।

अंत में शास्त्री जी ने कहा कि भारत की मूल आर्थिक शक्ति उसकी आंतरिक मांग, युवा जनसंख्या, तकनीकी दक्षता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास में निहित है। यदि नीति-निर्माता धैर्य, पारदर्शिता और दूरदृष्टि के साथ निर्णय लें, तो बाहरी टैरिफ युद्ध और राजनीतिक बयानबाज़ी दीर्घकाल में भारत की प्रगति को बाधित नहीं कर पाएगी। उनके अनुसार वर्तमान समय आत्मपरीक्षण, संरचनात्मक सुधार और वैश्विक अवसरों को पहचानने का है क्योंकि यह संधिकाल अंततः भारत को अधिक सुदृढ़ आर्थिक और कूटनीतिक स्थिति में स्थापित कर सकता है।

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Tarendra Dansena

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