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वैदिक गणित के प्रणेता: जगद्गुरु स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ

भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में कई ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने शोध और साधना से विश्व को नई दिशा दी। उन्हीं महान विभूतियों में एक नाम है जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज का, जिन्हें वैदिक गणित का प्रणेता माना जाता है।

14 मार्च 1884 को तमिलनाडु के तिन्निवेली में जन्मे स्वामी जी न केवल एक महान संत थे, बल्कि असाधारण प्रतिभा के धनी विद्वान भी थे। उनका बचपन का नाम वेंकटरमन था। बाल्यकाल से ही उनकी बुद्धिमत्ता इतनी प्रखर थी कि वे बहुत कम आयु में ही संस्कृत के गहन विद्वान बन गए।

अद्भुत प्रतिभा: 15 वर्ष की आयु में संस्कृत के विद्वान

स्वामी जी की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मात्र 15 वर्ष की आयु में वे संस्कृत भाषा में धारा प्रवाह बोलते थे। उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर जुलाई 1899 में मद्रास संस्कृत सभा ने उन्हें “सरस्वती” की उपाधि से सम्मानित किया।

इसके बाद उन्होंने मात्र 20 वर्ष की आयु में गणित सहित सात विषयों में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। यह उपलब्धि उस समय अत्यंत दुर्लभ मानी जाती थी और इससे उनकी विलक्षण बुद्धिमत्ता का परिचय मिलता है।

प्राचार्य से साधक तक का सफर

अपनी प्रतिभा के कारण स्वामी जी को राजमहेंद्रि के नेशनल कॉलेज में प्राचार्य के पद पर नियुक्त किया गया। परंतु उनका मन केवल सांसारिक उपलब्धियों में नहीं था।

अध्यात्म के प्रति गहरी रुचि और आत्मिक साधना की तीव्र इच्छा ने उन्हें एक नए मार्ग की ओर प्रेरित किया। इसी कारण वर्ष 1911 में उन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर श्रृंगेरी मठ का रुख किया, जहाँ उन्होंने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन आरंभ किया।

वेदों से निकले गणित के 16 सूत्र

1911 से 1918 के बीच स्वामी जी ने अथर्ववेद सहित अनेक वैदिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। इसी शोध के दौरान उन्होंने गणित के 16 मूल सूत्र और 13 उपसूत्र खोज निकाले।

इन सूत्रों के आधार पर उन्होंने एक नई गणितीय प्रणाली विकसित की जिसे उन्होंने “वैदिक गणित” नाम दिया।

यह प्रणाली इतनी सरल और प्रभावी है कि जटिल से जटिल गणितीय प्रश्नों को भी बहुत कम समय में हल किया जा सकता है।

वैदिक गणित की विशेषताएँ

जटिल गणनाओं को सरल बनाता है मानसिक गणना (Mental Calculation) को बढ़ावा देता है प्रतियोगी परीक्षाओं में अत्यंत उपयोगी गणित के भय को समाप्त करता है विद्यार्थियों की तार्किक क्षमता और स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

सन्यास और शंकराचार्य पद

4 जुलाई 1919 को स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी ने शारदापीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य त्रिविक्रम तीर्थ जी से सन्यास की दीक्षा प्राप्त की।

इसके बाद वर्ष 1925 में उन्हें जगन्नाथ पुरी स्थित गोवर्धन पीठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने आध्यात्मिक और बौद्धिक दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

खो गईं वैदिक गणित की मूल पांडुलिपियाँ

स्वामी जी ने वैदिक गणित के सूत्रों पर आधारित 16 विस्तृत खंडों की रचना की थी। दुर्भाग्यवश समय के साथ ये सभी पांडुलिपियाँ नष्ट हो गईं और इस क्षति की पुष्टि वर्ष 1956 में हुई।

इसके बाद 1957 में अमेरिका में रहते हुए स्वामी जी ने अपनी स्मृति के आधार पर “Vedic Mathematics” नामक पुस्तक पुनः लिखी।

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि उन्होंने वृद्धावस्था और कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद इस पुस्तक को केवल डेढ़ महीने में लिख दिया।

“वैदिक गणित गणना की एक ऐसी पद्धति है जो गणित को सरल, रोचक और आनंददायक बनाती है।”

— स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ

‘अश्रुरहित गणित’ की अवधारणा

स्वामी जी का मानना था कि गणित विद्यार्थियों के लिए भय का विषय नहीं होना चाहिए।

उन्होंने वैदिक गणित को “अश्रुरहित गणित” (Tearless Mathematics) कहा, क्योंकि यह गणित को इतना सरल और रोचक बना देता है कि विद्यार्थी इसे सहज रूप से समझ सकते हैं।

आज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों विद्यार्थी वैदिक गणित की विधियों का उपयोग कर गणना की गति और सटीकता बढ़ा रहे हैं।

अमर विरासत

2 फरवरी 1960 को मुंबई में स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज ने महासमाधि ग्रहण की।

यद्यपि उनका भौतिक शरीर आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन वैदिक गणित के रूप में उनकी अमूल्य विरासत आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान की नई दिशा दे रही है।

भारत के लिए यह गर्व की बात है कि वैदिक गणित जैसी अद्भुत गणितीय प्रणाली हमारी प्राचीन वैदिक परंपरा की देन है।

स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि ज्ञान, साधना और शोध के माध्यम से मानवता को अमूल्य योगदान दिया जा सकता है।

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Kanha Shastri

Kanha Shastri