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पेलमा कोयला खदान परियोजना पर रायगढ़ में ऐतिहासिक जनसुनवाई, समर्थन और विरोध के स्वर रहे बराबर

रायगढ़। जिले के तमनार विकासखंड अंतर्गत प्रस्तावित पेलमा ओपनकास्ट कोयला खदान परियोजना को लेकर सोमवार को आयोजित जनसुनवाई शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हो गई। क्षेत्र के भविष्य, औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन, पर्यावरणीय प्रभाव और संभावित विस्थापन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर दिनभर चर्चा और बहस का दौर चलता रहा। बड़ी संख्या में ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों तथा प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में आयोजित इस जनसुनवाई में परियोजना के पक्ष और विपक्ष दोनों पक्षों ने विस्तार से अपनी बातें रखीं।

साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) द्वारा प्रस्तावित इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत लगभग 2077.934 हेक्टेयर भूमि में ओपनकास्ट कोयला खदान विकसित की जानी है। परियोजना की प्रस्तावित वार्षिक उत्पादन क्षमता 15 मिलियन टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) निर्धारित की गई है। खदान परियोजना का प्रभाव पेलमा, उरबा, मडुआडूमर, लालपुर, हिंझर, जरहीडीह, सकत्ता, मीलूपार और खर्रा सहित आसपास के कई गांवों पर पड़ने वाला है। इसी कारण जनसुनवाई को लेकर लंबे समय से क्षेत्र में उत्सुकता और चर्चाओं का माहौल बना हुआ था।

सुबह से जुटने लगे ग्रामीण

जनसुनवाई स्थल पेलमा गांव के अटल चौक में सुबह से ही ग्रामीणों का पहुंचना शुरू हो गया था। निर्धारित समय पर प्रशासनिक अधिकारियों एवं पर्यावरण विभाग के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में कार्यवाही प्रारंभ हुई। कार्यक्रम में प्रभावित गांवों के लोगों को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया, जहां कई ग्रामीणों ने रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य और क्षेत्रीय विकास की संभावनाओं को देखते हुए परियोजना का समर्थन किया।

समर्थन करने वाले वक्ताओं का कहना था कि क्षेत्र में उद्योगों और खनन गतिविधियों के विस्तार से युवाओं को रोजगार मिलेगा, स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिलेगा तथा आधारभूत सुविधाओं का विकास होगा। उनका मानना था कि उचित पुनर्वास और मुआवजा नीति के साथ परियोजना क्षेत्र के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

विरोध करने वालों ने उठाए पर्यावरण और विस्थापन के मुद्दे

दूसरी ओर कई ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने परियोजना के संभावित दुष्प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कृषि भूमि के नुकसान, पर्यावरण प्रदूषण, जल स्रोतों पर प्रभाव, जंगलों के क्षरण तथा ग्रामीणों के विस्थापन जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। वक्ताओं ने कहा कि परियोजना से प्रभावित परिवारों के भविष्य, आजीविका और सामाजिक संरचना पर पड़ने वाले प्रभावों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

कई ग्रामीणों ने मांग की कि यदि परियोजना को स्वीकृति दी जाती है तो प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, स्थायी रोजगार, बेहतर पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित की जाए।

सुरक्षा के रहे कड़े इंतजाम

जनसुनवाई को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। कार्यक्रम स्थल पर किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए थे। हालांकि पूरे दिन के दौरान कहीं भी तनाव, टकराव या कानून-व्यवस्था संबंधी कोई समस्या सामने नहीं आई। जनसुनवाई पूरी तरह शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हुई।

शाम तक जारी रही प्रक्रिया

समर्थन, आपत्ति और सुझाव दर्ज कराने का सिलसिला शाम तक चलता रहा। ग्रामीणों द्वारा रखे गए सभी अभिमतों को विधिवत रिकॉर्ड किया गया। लगभग शाम छह बजे जनसुनवाई की औपचारिक प्रक्रिया समाप्त हुई। इसके बाद संबंधित विभागों द्वारा प्राप्त सुझावों और आपत्तियों का संकलन प्रारंभ किया गया।

अधिकारी ने दी जानकारी

पर्यावरण अधिकारी मनवेन्द्र शेखर पांडे ने बताया कि जनसुनवाई निर्धारित समय पर प्रारंभ हुई और शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई। उन्होंने कहा कि परियोजना के समर्थन और विरोध में अपनी बात रखने वालों की संख्या लगभग बराबर रही। अंतिम आंकड़ों का संकलन अभी किया जा रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पूरे कार्यक्रम के दौरान किसी भी प्रकार की तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न नहीं हुई और प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी की गई।

जनसुनवाई के दौरान दर्ज किए गए सुझाव, आपत्तियां और अभिमत पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे। इन्हें संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जिसके आधार पर परियोजना के भविष्य को लेकर आगे निर्णय लिया जाएगा। क्षेत्र के हजारों लोगों को प्रभावित करने वाली इस परियोजना पर अब शासन, पर्यावरणीय एजेंसियों और संबंधित विभागों की आगामी कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

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Tarendra Dansena

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