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सावन हमें सिखाता है-विष पीना सीखो, विष फैलाना नहीं : पंडित कान्हा शास्त्री

धर्म डेस्क । सावन का महीना भगवान शिव की पूजा, जलाभिषेक और व्रत-उपवास का अवसर के साथ-साथ आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का भी समय है। शिव का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने भीतर धैर्य, संयम और विवेक बनाए रखना चाहिए। आज जब समाज में छोटी-छोटी बातों पर विवाद, कटुता और नफरत बढ़ती दिखाई देती है, तब सावन का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

समुद्र मंथन से जब हलाहल विष निकला और उससे समस्त सृष्टि के विनाश का संकट उत्पन्न हुआ, तब भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। उन्होंने विष को संसार में फैलने नहीं दिया और इसी कारण वे नीलकंठ कहलाए। इस कथा का आध्यात्मिक संदेश बहुत गहरा है। जीवन में हमें भी अनेक बार कटु शब्द, अपमान, आलोचना, धोखा और नकारात्मक परिस्थितियां मिलती हैं। हम हर परिस्थिति को बदल नहीं सकते, लेकिन यह जरूर तय कर सकते हैं कि उस नकारात्मकता को अपने माध्यम से आगे न बढ़ने दें।

आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार दिया है, लेकिन दुर्भाग्य से इसी स्वतंत्रता का उपयोग कई बार नफरत और विवाद फैलाने में भी होने लगा है। किसी की बात पसंद नहीं आई तो तुरंत प्रतिक्रिया, किसी की सफलता अच्छी नहीं लगी तो आलोचना और किसी से वैचारिक मतभेद हुआ तो व्यक्तिगत टिप्पणी-यह प्रवृत्ति समाज को भीतर से कमजोर कर रही है। हमें यह समझना होगा कि हर बात का जवाब देना आवश्यक नहीं होता और हर विवाद में शामिल होना भी समझदारी नहीं है।

शिव हमें सिखाते हैं कि विष को पहचानना जरूरी है, लेकिन उसे फैलाना जरूरी नहीं। किसी ने हमारे साथ गलत किया, इसका अर्थ यह नहीं कि हम भी वही व्यवहार किसी दूसरे के साथ करें। किसी ने कटु शब्द कहे, तो हमें भी कटुता से जवाब देना ही पड़े-ऐसा कोई नियम नहीं है। कई बार मौन, संयम और समय ही सबसे प्रभावी उत्तर होते हैं।

आज परिवारों में भी अहंकार और छोटी-छोटी गलतफहमियों के कारण रिश्तों में दूरी बढ़ रही है। भाई-भाई से बात नहीं करता, मित्र वर्षों की मित्रता भूल जाते हैं और पति-पत्नी छोटी बातों को मन में रखकर संबंधों में कड़वाहट बढ़ाते जाते हैं। समस्या मतभेद में नहीं है; समस्या तब पैदा होती है जब मतभेद मनभेद बन जाता है। शिव का संदेश हमें बताता है कि विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन हृदय में द्वेष रखना आवश्यक नहीं है।

सच्ची शिवभक्ति केवल मंदिर जाकर जल चढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि हम शिवलिंग पर जल चढ़ाएं लेकिन हमारी वाणी किसी के हृदय को दुखाती रहे, यदि हम महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें लेकिन मन में दूसरों के प्रति घृणा भरी रहे, तो हमें एक बार स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि हमारी साधना हमारे व्यवहार में कितना परिवर्तन ला रही है। शिव को जल चढ़ाने के साथ यदि हम अपने क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष को भी थोड़ा कम कर सकें, तो यही सावन की सच्ची साधना होगी।

आज के समय में सबसे बड़ा विष केवल कोई पदार्थ नहीं है। हमारे भीतर जमा क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, बदले की भावना और दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति भी एक प्रकार का विष है। यह विष पहले हमारे अपने मन को अशांत करता है और फिर हमारे व्यवहार के माध्यम से परिवार और समाज तक पहुंचता है। इसलिए सावन हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देता है कि आखिर हम अपने मन में क्या संजोकर बैठे हैं।

हालांकि विष पीने का अर्थ अन्याय को सहते रहना भी नहीं है। शिव का स्वरूप हमें कमजोरी नहीं, बल्कि विवेक और शक्ति का संदेश देता है। जहां प्रेम और संवाद से समाधान हो सकता है, वहां संवाद करना चाहिए और जहां दृढ़ता आवश्यक हो, वहां दृढ़ता भी रखनी चाहिए। अंतर केवल इतना है कि हमारा निर्णय क्रोध और बदले की भावना से नहीं, बल्कि विवेक से प्रेरित हो।

सावन प्रकृति के नवजीवन का भी प्रतीक है। वर्षा से धरती हरी होती है, पेड़-पौधों में नई ऊर्जा आती है और वातावरण में नई चेतना दिखाई देती है। उसी प्रकार हमें भी अपने भीतर सकारात्मक विचारों का बीजारोपण करना चाहिए। पुरानी कड़वाहट को छोड़ना, रिश्तों में प्रेम बढ़ाना, जरूरतमंद की सहायता करना और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी शिव आराधना का ही एक सुंदर रूप है।

इस सावन हम केवल यह संकल्प न लें कि भगवान शिव को कितने लोटे जल चढ़ाएंगे, बल्कि यह भी संकल्प लें कि हमारी वाणी से किसी के जीवन में अनावश्यक विष न घुले। हम सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाली सामग्री को आगे न बढ़ाएं, बिना सत्य जाने किसी के बारे में निर्णय न दें, क्रोध में शब्दों का चयन न करें और किसी की सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय उससे प्रेरणा लेने का प्रयास करें।

भगवान शिव ने हलाहल को अपने भीतर रोककर संसार को बचाया था। हम भी अपने जीवन में मिलने वाली हर नकारात्मकता को दूसरों तक पहुंचाने से रोक सकते हैं। हम हर परिस्थिति को नहीं बदल सकते, हर व्यक्ति को नहीं बदल सकते और हर समस्या का समाधान तुरंत नहीं कर सकते, लेकिन अपने व्यवहार को नियंत्रित जरूर कर सकते हैं।

इसलिए इस सावन शिव से केवल सुख, समृद्धि और सफलता न मांगें। उनसे यह भी प्रार्थना करें कि हमें इतना विवेक दें कि हम गलत को पहचान सकें, इतना धैर्य दें कि क्रोध में गलत निर्णय न लें, इतनी करुणा दें कि दूसरों के दर्द को समझ सकें और इतनी शक्ति दें कि जीवन का विष समाज में फैलाने के बजाय उसे अपने संयम से रोक सकें।

हर हर महादेव।

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Tarendra Dansena

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