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अधिकमास:जब समय भी करता है आध्यात्मिक संतुलन की साधना

धर्म डेस्क । सनातन संस्कृति में समय केवल दिनों और महीनों का गणित नहीं, बल्कि चेतना, साधना और धर्म का प्रवाह माना गया है। भारतीय पंचांग की यही विशेषता उसे विश्व की अन्य कालगणनाओं से अलग करती है। इसी अद्भुत वैदिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है “अधिकमास”, जिसे “पुरुषोत्तम मास” के नाम से भी जाना जाता है। यह केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, ईश्वर भक्ति, दान और जीवन के आध्यात्मिक संतुलन का विशेष अवसर माना गया है।

वर्ष 2026 में अधिकमास 17 मई से प्रारंभ होकर 15 जून तक रहेगा। इस बार यह “अधिक ज्येष्ठ मास” के रूप में आएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पूरा मास भगवान श्रीविष्णु को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस अवधि में किए गए जप, तप, दान, व्रत और सत्कर्म का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है।

अधिकमास क्यों आता है?

ज्योतिर्विद पंडित कान्हा शास्त्री बताते हैं कि हिंदू पंचांग चंद्र और सूर्य दोनों की गति पर आधारित है। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का। दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर उत्पन्न होता है। यही अंतर लगभग 32 महीने 16 दिन में एक अतिरिक्त महीने के रूप में जुड़ जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।

यह केवल खगोलीय गणना नहीं, बल्कि समय और प्रकृति के संतुलन की वैदिक व्यवस्था है। आधुनिक विज्ञान जहां इसे कैलेंडर संतुलन के रूप में देखता है, वहीं सनातन परंपरा इसे आत्मिक ऊर्जा और साधना के विशेष काल के रूप में स्वीकार करती है।

क्यों कहलाता है “पुरुषोत्तम मास”?

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब इस अतिरिक्त मास को कोई देवता स्वीकार नहीं कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम और सम्मान प्रदान किया। तभी से यह “पुरुषोत्तम मास” कहलाया। मान्यता है कि इस मास में भगवान विष्णु की उपासना विशेष फलदायी होती है।

मासानां पुरुषोत्तमोऽयं, पुण्यदः पापनाशनः।
भक्त्या यः पूजयेद् विष्णुं, तस्य कल्याणमव्ययम्॥

अर्थात-यह पुरुषोत्तम मास पापों का नाश करने वाला और महान पुण्य देने वाला है। जो व्यक्ति श्रद्धा से भगवान विष्णु की आराधना करता है, उसका कल्याण निश्चित होता है।

अधिकमास में क्या करें?

अधिकमास को साधना और संयम का काल माना गया है। इस दौरान विशेष रूप से निम्न कार्यों का महत्व बताया गया है-

• भगवान विष्णु की पूजा और विष्णु सहस्रनाम का पाठ
• श्रीमद्भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवत कथा श्रवण
• “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप
• एकादशी व्रत एवं सत्संग
• तुलसी पूजन और दीपदान
• गौसेवा एवं अन्नदान
• ब्राह्मण, गरीब और जरूरतमंदों की सहायता

ज्योतिर्विद पंडित कान्हा शास्त्री कहते हैं कि अधिकमास केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने और जीवन की नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्यागने का अवसर देता है। इस समय यदि व्यक्ति क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और लोभ से दूर रहकर सेवा और करुणा का मार्ग अपनाता है, तो उसका मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है।

दान का विशेष महत्व

सनातन धर्म में दान को धर्म का आधार कहा गया है, लेकिन अधिकमास में इसका महत्व और बढ़ जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस अवधि में अन्नदान, वस्त्रदान, जलदान, गौसेवा और धार्मिक ग्रंथों का वितरण अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।

पंडित कान्हा शास्त्री बताते हैं कि दान केवल धन देने का नाम नहीं है। किसी भूखे को भोजन देना, किसी दुखी व्यक्ति को सहारा देना, किसी विद्यार्थी की सहायता करना अथवा समाज के हित में कार्य करना भी दान का ही स्वरूप है।

उन्होंने एक श्लोक उद्धृत करते हुए कहा-

दानं जपश्च तपश्चैव, विष्णुभक्तिः विशेषतः।
अधिके मासि यः कुर्यात्, तस्य पुण्यं अनन्तकम्॥

अर्थात-जो व्यक्ति अधिकमास में दान, जप, तप और भगवान विष्णु की भक्ति करता है, उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।

क्यों नहीं होते मांगलिक कार्य?

अधिकमास में सामान्यतः विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन और अन्य शुभ मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय बाहरी उत्सवों की अपेक्षा आंतरिक साधना और ईश्वर आराधना के लिए अधिक उपयुक्त माना गया है। हालांकि पूजा-पाठ, कथा, दान और आध्यात्मिक कार्यक्रम पूरे उत्साह से किए जाते हैं।

आधुनिक जीवन में अधिकमास का संदेश

आज का मनुष्य भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में मानसिक शांति खोता जा रहा है। ऐसे समय में अधिकमास हमें ठहरकर स्वयं को समझने की प्रेरणा देता है। यह मास बताता है कि जीवन केवल सफलता और संग्रह का नाम नहीं, बल्कि सेवा, संयम, करुणा और आध्यात्मिक संतुलन का भी मार्ग है।

पुरुषोत्तम मास का वास्तविक अर्थ केवल व्रत और अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने भीतर “श्रेष्ठ पुरुष” के गुणों को जागृत करना है। यदि व्यक्ति इस अवधि में अपने व्यवहार, विचार और कर्म को सकारात्मक दिशा देता है, तो यही अधिकमास का सच्चा पालन माना जाएगा। अंततः अधिकमास हमें यह स्मरण कराता है कि समय का सर्वोत्तम उपयोग वही है, जो मनुष्य को ईश्वर, धर्म और मानवता के अधिक निकट ले जाए।

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Tarendra Dansena

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