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“बिना पेनिट्रेशन दुष्कर्म नहीं, सिर्फ प्रयास” : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला

बिलासपुर। दुष्कर्म मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील निर्णय सुनाया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि महिला के गुप्तांग में पेनिट्रेशन (प्रवेश) नहीं हुआ, लेकिन आरोपी ने इजैक्युलेशन कर दिया, तो इसे दुष्कर्म नहीं बल्कि केवल दुष्कर्म का प्रयास माना जाएगा।

मामला और ट्रायल कोर्ट का फैसला

यह पुराना मामला 2004 का है, जब आरोपी ने बहला-फुसला कर युवती को अपने घर ले जाकर कमरे में बंद किया और उसके हाथ-पैर बांध दिए। ट्रायल कोर्ट ने साल 2005 में आरोपी को धारा 376(1) के तहत 7 साल का कठोर कारावास और 200 रुपए जुर्माना, तथा धारा 324 के तहत 6 महीने की सजा सुनाई थी।इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट की सिंगल बेंच जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने सुनवाई के दौरान पाया कि पीड़िता के बयान में पेनिट्रेशन को लेकर विरोधाभास है। मेडिकल रिपोर्ट में हाइमेन सुरक्षित पाया गया और डॉक्टर ने दुष्कर्म पर निर्णायक राय नहीं दी।

कोर्ट ने कहा कि कानूनन पूर्ण प्रवेश (पेनिट्रेशन) जरूरी है, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह साबित नहीं होता कि दुष्कर्म हुआ है। तथ्यों से यह स्पष्ट हुआ कि आरोपी ने दुष्कर्म का प्रयास किया, लेकिन पूरी तरह सफल नहीं हुआ।

सजा में बदलाव

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में मामूली बदलाव करते हुए:आरोपी को धारा 376/511 (दुष्कर्म का प्रयास) के तहत दोषी ठहराया। सजा घटाकर 3 साल 6 महीने का कठोर कारावास और 200 रुपए जुर्माना सुनाया। धारा 342 के तहत 6 महीने की सजा बरकरार रखी गई, और दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। आरोपी के जमानत बांड निरस्त कर उसे 2 महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने के आदेश दिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह का कृत्य गंभीर अपराध है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

इजैक्युलेशन क्या होता है?

इजैक्युलेशन का अर्थ है वीर्य (स्पर्म) का शरीर से बाहर निकलना। यह दो तरह से हो सकता है: कॉन्शियस इजैक्युलेशन-जानबूझकर होता है। नाइट फॉल-नींद में या सपने में स्वतः होता है।नाइट फॉल किशोरावस्था (12–14 वर्ष) में शुरू हो सकता है।

यह फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और उसके प्रयास के बीच के कानूनी अंतर को स्पष्ट करते हुए सुनाया है, जो समाज और न्याय प्रणाली दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दुष्कर्म के दौरान पेनिट्रेशन नहीं हुआ, तो केवल इजैक्युलेशन होने पर इसे पूर्ण दुष्कर्म नहीं बल्कि दुष्कर्म का प्रयास माना जाएगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आरोपी का कृत्य हल्का है; अदालत ने इसे गंभीर आपराधिक स्वभाव वाला कृत्य बताया और सख्ती से निपटने की आवश्यकता जताई। इस निर्णय से यह संदेश भी मिलता है कि कानून केवल तकनीकी तथ्यों पर ही आधारित नहीं है बल्कि पीड़िता की सुरक्षा और समाज की संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखता है। साथ ही, यह समाज को सचेत करने वाला निर्णय है कि ऐसे अपराधों के प्रति सतर्क रहना और उन्हें रोकना न केवल कानूनी दायित्व है बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है, क्योंकि दुष्कर्म का प्रयास भी पीड़िता पर गहरा मानसिक और भावनात्मक प्रभाव डालता है और इससे निपटना अत्यंत आवश्यक है।

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Tarendra Dansena

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