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मिलावट,बाजारवाद और बिगड़ती जीवनशैली से जूझता राष्ट्र-पंडित कान्हा शास्त्री

स्वस्थ भारत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा: घटिया खाद्य पदार्थ

किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके नागरिकों के स्वास्थ्य से होती है। दुर्भाग्य यह है कि आज भारत में बीमारी केवल अस्पतालों से नहीं, बल्कि रसोई और बाज़ार से जन्म ले रही है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 15 अगस्त 2025 को अपने 79वें स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में बढ़ते मोटापे को एक गंभीर राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट बताया था। यह चेतावनी केवल जीवनशैली सुधार की नहीं थी, बल्कि उस खाद्य तंत्र पर सवाल था जो मुनाफ़े के लिए नागरिकों के स्वास्थ्य से समझौता कर रहा है।

आज भारत के बाज़ारों में नकली पनीर, मिलावटी दूध, घटिया तेल और निम्न गुणवत्ता के पैकेज्ड फूड खुलेआम बिक रहे हैं। नकली पनीर, जो दूध से नहीं बल्कि केमिकल, स्टार्च और सस्ते पाम ऑयल से तैयार होता है, बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक की थाली में पहुँच चुका है। इसके दुष्परिणाम सामने हैं बच्चों में मोटापा और हार्मोनल असंतुलन, युवाओं में फैटी लिवर, महिलाओं में थायरॉयड और PCOD, तथा बुज़ुर्गों में हृदय और शुगर जैसी बीमारियों का विस्फोट।

चिंता की बात यह है कि यह समस्या केवल असंगठित क्षेत्र तक सीमित नहीं है। भारत में काम कर रही कई मल्टीनेशनल कंपनियाँ दोहरी गुणवत्ता नीति अपनाए हुए हैं। जिन उत्पादों को वे यूरोप या अन्य विकसित देशों में बेहतर सामग्री और कड़े पोषण मानकों के साथ बेचती हैं, वही उत्पाद भारत में सस्ते तेल, अधिक वसा और अधिक नमक के साथ परोसे जाते हैं। यह सिर्फ़ व्यापारिक चालाकी नहीं, बल्कि भारतीय उपभोक्ता को दूसरे दर्जे का नागरिक मानने की मानसिकता है।

यह प्रश्न अब केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गरिमा और उपभोक्ता अधिकार का बन चुका है। क्या भारत केवल घटिया और असुरक्षित खाद्य पदार्थों का डंपिंग ग्राउंड है? क्या हमारे बच्चे ऐसे प्रयोगों के लिए हैं, जो अन्य देशों में स्वीकार्य नहीं?

अब समय आ गया है कि आधे-अधूरे सुधारों की जगह कठोर और निर्णायक कार्रवाई की जाए। नकली पनीर और खाद्य मिलावट को गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाना चाहिए। बार-बार दोषी पाए जाने वाले निर्माताओं और ब्रांड्स के लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द हों। FSSAI को काग़ज़ी नियमों तक सीमित रखने के बजाय ज़मीनी प्रवर्तन एजेंसी के रूप में सशक्त किया जाए। भारत में बिकने वाले हर वैश्विक ब्रांड पर यह बाध्यता हो कि वह अपने मूल देश के समान गुणवत्ता और पोषण मानक अपनाए इसमें कोई समझौता न हो।

नागरिक यह अपेक्षा नहीं करता कि सरकार उसकी थाली सजाए, लेकिन यह अपेक्षा अवश्य करता है कि उसकी थाली में ज़हर न परोसा जाए। सुरक्षित भोजन कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है। यदि आज इस विषय पर कठोर निर्णय नहीं लिए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें केवल बीमार शरीर नहीं, बल्कि एक असफल व्यवस्था की विरासत के लिए याद करेंगी।देश का स्वास्थ्य ही देश का भविष्य है।और भविष्य से समझौता करने का अधिकार किसी को नहीं।

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Kanha Shastri

Kanha Shastri