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रेपो रेट स्थिर, लेकिन RBI की चिंता का नया केंद्र बना रुपया; वैश्विक संकट के बीच बदली मौद्रिक नीति की दिशा

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की जून 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में भले ही रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा गया हो, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार की नीति बैठक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश ब्याज दरों से नहीं, बल्कि भारतीय रुपये की स्थिति से जुड़ा हुआ है। लगातार तीसरी बार रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिला कि RBI फिलहाल अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त झटका देने के बजाय स्थिरता बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है। हालांकि इसके पीछे छिपी चिंता अब महंगाई से कहीं अधिक रुपये की गिरती कीमत और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता को लेकर दिखाई दे रही है।

RBI ने स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) को 5 प्रतिशत तथा मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) को 5.50 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। नीति की भाषा में संतुलन, सतर्कता और आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेने की बात कही गई है, लेकिन आर्थिक जानकारों का कहना है कि यह केवल सतही तस्वीर है। वास्तव में RBI अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां उसे घरेलू आर्थिक संकेतकों के साथ-साथ वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाओं और मुद्रा बाजार की चुनौतियों को भी समान महत्व देना पड़ रहा है।

पश्चिम एशिया संकट और तेल कीमतों ने बढ़ाई चिंता

फरवरी 2026 में पश्चिम एशिया में शुरू हुए संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस दौरान ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में लगभग 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं। वर्तमान में भी तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं।

भारत अपनी लगभग 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात के माध्यम से पूरी करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। तेल का भुगतान डॉलर में होने के कारण यदि रुपया कमजोर होता है तो आयात की लागत और बढ़ जाती है। यही स्थिति फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।

एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हुआ रुपया

वर्ष 2026 में भारतीय रुपया एशिया की प्रमुख मुद्राओं में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा है। वर्ष की शुरुआत में एक डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 90 के स्तर पर था, जो अब गिरकर 96 रुपये प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया है। इस प्रकार रुपये में करीब 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जिसमें से अधिकांश गिरावट पश्चिम एशियाई संघर्ष के बाद देखने को मिली।

रुपये की इस कमजोरी का प्रभाव केवल विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं है। इससे पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक कच्चा माल और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। परिणामस्वरूप महंगाई बढ़ती है और आम नागरिक की क्रय शक्ति प्रभावित होती है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बढ़ा दबाव

रुपये पर दबाव बढ़ने का एक बड़ा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली भी है। विदेशी निवेशक भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजारों से धन निकालकर डॉलर में परिवर्तित कर रहे हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ी है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

सरकारी बॉन्ड की दीर्घकालिक यील्ड भी फिर से 7 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है, जो बाजार में बढ़ती अनिश्चितता का संकेत मानी जा रही है।

विदेशी मुद्रा भंडार में 33 अरब डॉलर की कमी

रुपये की अत्यधिक गिरावट को रोकने के लिए RBI लगातार विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। केंद्रीय बैंक ने डॉलर बेचकर और विभिन्न तरलता प्रबंधन उपायों के जरिए बाजार को स्थिर रखने का प्रयास किया है।

इसके परिणामस्वरूप भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 33 अरब डॉलर की कमी आई है और यह घटकर लगभग 690 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि यह भंडार अभी भी दुनिया के सबसे मजबूत विदेशी मुद्रा भंडारों में गिना जाता है, लेकिन लगातार हस्तक्षेप से RBI की चिंता स्पष्ट दिखाई देती है।

RBI ने क्यों नहीं बढ़ाई ब्याज दरें?

सामान्य आर्थिक सिद्धांत कहता है कि जब किसी देश की मुद्रा कमजोर होती है तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाकर विदेशी पूंजी को आकर्षित करता है। इंडोनेशिया, फिलीपींस और श्रीलंका जैसे कई देशों ने ऐसा किया भी है।

लेकिन RBI ने इस रास्ते पर नहीं चलने का फैसला किया। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ब्याज दरों में वृद्धि से उद्योगों के लिए कर्ज महंगा हो जाएगा, निवेश प्रभावित होगा और आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है। ऐसे समय में जब वैश्विक परिस्थितियां पहले ही आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बना रही हैं, RBI विकास दर को और कमजोर नहीं करना चाहता।

इसी कारण केंद्रीय बैंक ने मुद्रा स्थिरता के लिए ब्याज दरों की बजाय विदेशी मुद्रा प्रबंधन, पूंजी प्रवाह बढ़ाने और बाजार हस्तक्षेप जैसी रणनीतियों को प्राथमिकता दी है।

विकास दर घटी, महंगाई बढ़ी

RBI की नवीनतम समीक्षा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आर्थिक विकास दर का अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं मुद्रास्फीति (महंगाई) का अनुमान बढ़ाकर लगभग 5.1 प्रतिशत कर दिया गया है।

यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी चुनौती पैदा करती है। एक ओर विकास दर धीमी पड़ रही है, वहीं दूसरी ओर महंगाई बढ़ रही है। विशेषज्ञ इसे “स्टैगफ्लेशन” जैसी परिस्थितियों की शुरुआती चेतावनी के रूप में भी देख रहे हैं, हालांकि भारत अभी उस स्थिति से काफी दूर है।

RBI का नया फोकस : महंगाई नहीं, मुद्रा स्थिरता

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अपने वक्तव्य में कहा कि केंद्रीय बैंक वैश्विक अनिश्चितताओं और उनके महंगाई तथा वित्तीय स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर पूरी तरह सतर्क है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 4 प्रतिशत महंगाई का लक्ष्य अभी भी RBI के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता बना हुआ है।

हालांकि जून 2026 की नीति समीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि अब RBI महंगाई नियंत्रण के साथ-साथ रुपये की स्थिरता को भी समान महत्व दे रहा है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में रुपया अब केवल मौद्रिक नीति का परिणाम नहीं रह गया है, बल्कि वह स्वयं नीति निर्माण का एक प्रमुख निर्धारक बन चुका है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जारी रहता है, तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और विदेशी निवेशकों की बिकवाली नहीं रुकती है, तो आने वाले महीनों में RBI के सामने और बड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। ऐसे में केंद्रीय बैंक को विकास, महंगाई और मुद्रा स्थिरता के बीच बेहद संतुलित नीति अपनानी होगी।

जून 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की आर्थिक कहानी अब केवल ब्याज दरों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएं, तेल बाजार और रुपये की मजबूती आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारक बनने जा रहे हैं।

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Kanha Shastri

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