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फागुन : एक आत्मसंवाद

✍🏻 – पंडित कान्हा शास्त्री

फागुन आया-
पर इस बार उसने धीरे से दस्तक दी,
जैसे पूछ रहा हो-
“क्या तुम्हारे भीतर अभी भी कोई आँगन शेष है?”

नगर रंगों से भर उठा है,
पर आँखों में धूल अधिक है, उजास कम।
हाथों में पिचकारियाँ हैं,
पर शब्दों में अब भी शूल का क्रम।

कभी यह पर्व
मनुष्य होने का सार्वजनिक उत्सव था,
जहाँ एक चुटकी अबीर
सदियों का वैर धो देती थी।

अब हम रंगते तो हैं-
पर देह को, विचारों को नहीं;
हम हँसते तो हैं-
पर भीतर की दीवारों को नहीं।

होलिका जलती है प्रतिवर्ष,
किन्तु अहं का दावानल शेष रहता है;
प्रह्लाद की निष्ठा कहीं
दैनिक कोलाहल में अवशेष रहता है।

फागुन कहता है-
“रंगों से अधिक मन को भीगने दो,
अपने भीतर के कठोर शिलाखंडों को
करुणा की धूप में पिघलने दो।”

यदि इस बार
एक मन दूसरे मन से सच में मिल जाए,
तो समझना-
होली केवल खेली नहीं गई,
जी भी गई है।✨

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Kanha Shastri

Kanha Shastri