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काशी से गूंजा गोरक्षा का शंखनाद: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की ‘गो-प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध यात्रा’ शुरू, लखनऊ तक करेंगे जनजागरण

काशी। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शुक्रवार को काशी की पावन धरती से गो-प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध यात्रा का औपचारिक शंखनाद कर दिया। साधु-संतों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति में उन्होंने केदार घाट पर मां गंगा का वैदिक विधि-विधान से पूजन किया और गोरक्षा के लिए जनजागरण का आह्वान किया। इस दौरान घाट पर आध्यात्मिक वातावरण के बीच गंगा आरती और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यात्रा के आरंभ की घोषणा की गई।

शंकराचार्य ने कहा कि सनातन धर्म में गाय को माता का स्थान दिया गया है और उसकी रक्षा करना समाज तथा राज्य दोनों का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि जब तक गाय, ब्राह्मण और देवालय सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक धर्म और संस्कृति की रक्षा संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से उन्होंने देशभर में जनजागरण के लिए इस यात्रा की शुरुआत की है।

शनिवार को काशी से लखनऊ के लिए प्रस्थान

शंकराचार्य शनिवार की सुबह श्री चिंतामणि गणेश मंदिर और संकटमोचन हनुमान मंदिर में दर्शन-पूजन करने के बाद लखनऊ के लिए रवाना होंगे। यह यात्रा चार दिनों तक चलेगी और विभिन्न जिलों से गुजरते हुए 11 मार्च को लखनऊ पहुंचेगी।

छह जिलों में जनसभाएँ और धर्मसभाएँ

इस यात्रा के दौरान शंकराचार्य जौनपुर, सुल्तानपुर, रायबरेली, उन्नाव और लखीमपुर खीरी सहित कुल छह जिलों में दर्जनभर से अधिक स्थानों पर जनसभाएँ और धर्मसभाएँ करेंगे। इन सभाओं के माध्यम से वे लोगों को गोरक्षा, सनातन परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूक करेंगे। साधु-संतों और सामाजिक संगठनों से भी इस अभियान में सहयोग की अपील की गई है।

40 दिन में गोमाता को ‘राज्यमाता’ घोषित करने की मांग

शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है कि 40 दिनों के भीतर गोमाता को “राज्यमाता” घोषित किया जाए और प्रदेश में पूर्ण रूप से गो-हत्या पर कठोर प्रतिबंध लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती पर उन्होंने यह मांग उठाई थी और अब उस दिन से 35 दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन अभी तक सरकार की ओर से कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है। इसी कारण उन्होंने अब गोरक्षा के लिए व्यापक जनआंदोलन की शुरुआत की है।

शिवाजी महाराज के आदर्शों का किया उल्लेख

अपने संबोधन में शंकराचार्य ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज सनातन धर्म और हिंदवी स्वराज्य के महान रक्षक थे। उन्होंने शास्त्रीय उदाहरण देते हुए बताया कि शिवाजी महाराज ने बचपन से ही गोरक्षा के प्रति दृढ़ संकल्प दिखाया था। कहा जाता है कि मात्र 12 वर्ष की आयु में उन्होंने एक गो-हत्यारे को दंडित कर गाय को उसके चंगुल से मुक्त कराया था और गोरक्षा के लिए जीवन समर्पित करने का संकल्प लिया था।

संभाजी महाराज के ग्रंथ ‘बुधभूषण’ का उल्लेख

शंकराचार्य ने शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी महाराज का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि संभाजी महाराज द्वारा रचित ग्रंथ ‘बुधभूषण’ में कहा गया है कि जो क्षत्रिय गाय, ब्राह्मण और मंदिरों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देता है, वह स्वर्ग का अधिकारी होता है और उसकी कीर्ति युगों-युगों तक अमर रहती है।

करपात्र गोभक्त सम्मान से सम्मानित

कार्यक्रम के दौरान अखिल भारतीय सारस्वत परिषद की ओर से शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को गोरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों के सम्मानस्वरूप “करपात्र गोभक्त सम्मान” से सम्मानित किया गया। परिषद के प्रतिनिधि गिरीश चंद्र तिवारी और प्रो. विवेकानंद तिवारी ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया।

कलाकारों ने प्रस्तुत की शिवाजी महाराज की लघु नाटिका

इस अवसर पर घाट पर मौजूद कलाकारों ने छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित एक लघु नाटिका की भावपूर्ण प्रस्तुति भी दी। इसमें शिवाजी महाराज के साहस, धर्मरक्षा और गोरक्षा के प्रसंगों को मंचित किया गया, जिसे उपस्थित लोगों ने काफी सराहा।

समाज से एकजुट होने की अपील

शंकराचार्य ने अंत में उपस्थित लोगों को गोरक्षा का संकल्प दिलाते हुए कहा कि आज समय आ गया है जब समाज को धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए एकजुट होकर आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि यह यात्रा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं बल्कि सनातन मूल्यों और गोरक्षा के लिए जनजागरण का अभियान है।

उन्होंने कहा कि यदि समाज जागरूक होकर आगे आएगा तो निश्चित ही गोरक्षा और धर्मरक्षा का लक्ष्य पूरा होगा।

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Kanha Shastri

Kanha Shastri